फिल्म रिव्यू: आवारापन 2 | रेटिंग: 3.5/5 | निर्देशक: नितिन कक्कड़ | शैली: क्राइम थ्रिलर
19 साल के लंबे इंतजार के बाद इमरान हाशमी एक बार फिर शिवम पंडित के किरदार में बड़े पर्दे पर लौटे हैं। 2007 में आई ‘आवारापन’ के इस सीक्वल में पुरानी मोहब्बत का दर्द, अकेलापन और दमदार संगीत तो है ही, साथ ही इस बार शिवम के सामने एक ऐसा मकसद है, जो उसे फिर से अपराध की अंधेरी दुनिया में लौटने के लिए मजबूर कर देता है। फिल्म में इमरान हाशमी का अभिनय सबसे मजबूत पक्ष है, जबकि कहानी कुछ जगहों पर अनुमानित और धीमी पड़ती नजर आती है।
क्या है ‘आवारापन 2’ की कहानी?
कहानी वहीं से आगे बढ़ती है, जहां पहली फिल्म की कहानी खत्म हुई थी। आलिया हामिद की मौत के बाद शिवम पंडित पूरी तरह अकेला हो चुका है। वह अपराध की दुनिया से दूर एक शांत जिंदगी जीने की कोशिश करता है और अपनी दिवंगत प्रेमिका की मजार के पास वक्त बिताता है। इसी दौरान उसे एक लावारिस नवजात बच्ची मिलती है। शिवम बच्ची को अनाथालय पहुंचाता है और अपनी पुरानी मोहब्बत की याद में उसका नाम आलिया रख देता है।
बाद में एक परिवार बच्ची को गोद ले लेता है। शिवम अपने भावनात्मक लगाव को पीछे रखते हुए बच्ची को उस परिवार के साथ जाने देता है। लेकिन जल्द ही उसे पता चलता है कि यह परिवार असली नहीं था और बच्ची मानव तस्करी के अंतरराष्ट्रीय गिरोह के जाल में फंस चुकी है। इसके बाद शिवम अपनी मासूम आलिया को बचाने के लिए फिर से उसी खूनी दुनिया में कदम रखता है, जिससे वह दूर जाने की कोशिश कर रहा था। उसकी तलाश उसे बैंकॉक तक ले जाती है, जहां उसे इस पूरे अपराध तंत्र की भयावहता का सामना करना पड़ता है।
इमरान हाशमी फिर बने फिल्म की जान
‘आवारापन 2’ की सबसे बड़ी ताकत इमरान हाशमी हैं। शिवम पंडित के रूप में उनका गंभीर चेहरा, खामोशी, बढ़ी हुई दाढ़ी और आंखों में दिखाई देने वाला दर्द किरदार को बेहद प्रभावशाली बनाता है। वह बिना ज्यादा संवाद के भी शिवम के अकेलेपन और टूटे हुए व्यक्तित्व को दर्शकों तक पहुंचाने में सफल रहते हैं।
इमरान को पर्दे पर देखते ही 2000 के दशक का वह दौर याद आ जाता है, जब उनके रोमांटिक और दर्द भरे किरदारों ने दर्शकों के बीच खास पहचान बनाई थी। शिवम इस बार भी वही टूटा हुआ इंसान है, लेकिन उसके सामने अपनी जिंदगी से जुड़ी एक नई जिम्मेदारी है।
दिशा पाटनी ने संभाला अहम किरदार
दिशा पाटनी ने फिल्म में जारा का किरदार निभाया है। शुरुआत में उनके किरदार को सीमित माना जा रहा था, लेकिन फिल्म में उन्हें अपेक्षाकृत ज्यादा जगह मिली है। कुछ दृश्यों में संवाद अदायगी थोड़ी कमजोर जरूर लगती है, लेकिन कुल मिलाकर उनका किरदार कहानी को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
पूरन गब्बी बने खौफनाक खलनायक
जोरावर के किरदार में पूरन गब्बी ने अलग तरह के खलनायक को पर्दे पर उतारा है। उनका किरदार सनकी, विचित्र और मानसिक रूप से अस्थिर नजर आता है। उनके तौर-तरीके और अजीब व्यवहार फिल्म के माहौल में बेचैनी पैदा करते हैं।
इमरान हाशमी जैसे अनुभवी अभिनेता के सामने खलनायक की भूमिका निभाना आसान नहीं था, लेकिन पूरन गब्बी ने अपने हिस्से का काम प्रभावी ढंग से किया है। हालांकि उनका किरदार जितना डरावना होना चाहिए था, उतना प्रभाव पैदा नहीं कर पाता और कई जगह वह खौफनाक से ज्यादा सनकी नजर आता है।
शबाना आजमी की मौजूदगी दमदार
शबाना आजमी नाफिसा के किरदार में नजर आई हैं, जो एक खूंखार गिरोह की मुखिया है। उनका स्क्रीन टाइम ज्यादा नहीं है, लेकिन जब भी वह पर्दे पर आती हैं, अपनी मौजूदगी दर्ज कराती हैं। उनके किरदार को थोड़ा और विस्तार दिया जाता तो कहानी का प्रभाव और बढ़ सकता था।
सुविंदर विक्की भी महत्वपूर्ण भूमिका में नजर आते हैं और अपने अभिनय से कहानी में गंभीरता जोड़ते हैं।
पुराने गानों ने जगाई 19 साल पुरानी यादें
फिल्म का संगीत इसके सबसे मजबूत हिस्सों में शामिल है। ‘तो फिर आओ’ और ‘तेरा मेरा रिश्ता पुराना’ जैसे पुराने गीतों को नए अंदाज में इस्तेमाल किया गया है। खासतौर पर जब पर्दे पर शिवम दिखाई देता है और ‘तो फिर आओ’ की धुन सुनाई देती है, तो 2007 की पहली फिल्म की यादें ताजा हो जाती हैं।
नए गीतों में ‘ये आवारापन’, ‘वे जुनून’ और ‘पिया घर आया’ भी फिल्म के भावनात्मक और गंभीर माहौल के साथ अच्छी तरह मेल खाते हैं। संगीत फिल्म के पुराने प्रशंसकों के लिए निश्चित तौर पर खास अनुभव लेकर आता है।
निर्देशन में नॉस्टैल्जिया के साथ नई कहानी
नितिन कक्कड़ ने मोहित सूरी के बाद निर्देशन की जिम्मेदारी संभाली है। निर्देशक ने यह समझने की कोशिश की है कि ‘आवारापन’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक बड़े दर्शक वर्ग की भावनाओं से जुड़ी याद है। इसलिए फिल्म में पुरानी कहानी के भाव को बनाए रखते हुए एक नया कथानक जोड़ा गया है।
मानव तस्करी का मुद्दा शिवम की व्यक्तिगत भावनात्मक यात्रा से जोड़ा गया है। फिल्म केवल पुराने किरदार और गानों के सहारे आगे नहीं बढ़ती, बल्कि शिवम को एक नया उद्देश्य भी देती है।
फिल्म में क्या है खास?
फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इमरान हाशमी का अभिनय है। शिवम पंडित का दर्द और उसकी खामोशी कहानी को भावनात्मक आधार देते हैं। पुराने गीतों का प्रभावी इस्तेमाल, नए संगीत के साथ उनका तालमेल और एक्शन दृश्यों को किरदार की भावनात्मक यात्रा से जोड़ना भी फिल्म को मजबूत बनाता है।
दिशा पाटनी, पूरन गब्बी और सुविंदर विक्की ने भी अपने-अपने किरदारों में अच्छा काम किया है।
कहां कमजोर पड़ती है ‘आवारापन 2’?
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी कहानी का कुछ हिस्सों में अनुमानित हो जाना है। शिवम के मानव तस्करी के गिरोह के पीछे जाने के बाद दर्शक आगे होने वाली कई घटनाओं का अंदाजा आसानी से लगा सकते हैं।
इंटरवल के बाद कहानी की रफ्तार भी कुछ जगहों पर धीमी हो जाती है। कई दृश्यों में वह बेचैनी और तेजी नहीं दिखाई देती, जिसकी कहानी को जरूरत थी। इसके अलावा पहली फिल्म के भावनात्मक प्रभाव पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता उन दर्शकों के लिए परेशानी पैदा कर सकती है, जिन्होंने 2007 वाली ‘आवारापन’ नहीं देखी है।
फाइनल वर्डिक्ट
‘आवारापन 2’ उन दर्शकों के लिए सबसे ज्यादा खास है, जिन्होंने 19 साल पहले शिवम पंडित को पसंद किया था। फिल्म पुराने दर्द, संगीत और मोहब्बत की यादों को वापस लाती है, लेकिन इस बार शिवम के हाथ में एक नया मकसद है।
कहानी में कुछ अनुमानित मोड़ और धीमे हिस्से जरूर हैं, लेकिन इमरान हाशमी का दमदार अभिनय, पुराने गानों का जादू और शिवम पंडित की भावनात्मक वापसी इन कमियों पर काफी हद तक भारी पड़ती है। जैसे ही पर्दे पर शिवम दिखाई देता है और ‘तो फिर आओ’ की धुन सुनाई देती है, 19 साल का इंतजार सार्थक महसूस होने लगता है।
रेटिंग: 3.5/5
